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वर्णाक्षरी कविता


अमित अनुपम अद्भुत माया,
आज चराचर है हर्षया,
इस धरती पर स्वर्ग से सुन्दर,
ईश्वर ने संसार बसाया।

उन प्रभु को शत शत वंदन,
ऊंच नीच का भेद हटाया,
ऋषियों की यह धरा सुहानी,
एक एक को ज्ञान कराया।

ऐसी अद्भुत शोभा जन की,
ओज तेजस्वी यहां कण कण की
और कहो क्या करूं बड़ाई,
अंधकार प्रभु हरते मन की।

अ: को लेकर नमः बनाया,
कई कई बार यह शीश झुकाया,
खग समान मैं उड़ूँ गगन में,
गई चेतना आ गई तन में।

घुम चुका जब यहां वहां सब
चमत्कार प्रभु देखा तब तब,
छत्र छाया में आपके हूँ अब,
जगत दिवाकर मिल गए जब।

झूम उठी यह सृष्टि सारी,
टन टन घंटी नाम पुकारी
ठहर ठहर कर महिमा गाए,
डम डम डमरू ध्वनि सुनाए।

ढोल मृदंग बजे यह पावन,
णमोकार मंत्र मन भावन,
तारणहार प्रभु जीवन के,
थर थर कांपे देह दुश्मन के।

दर्शन देकर पीड़ा हरते,
धन्य धरा पर क्रीड़ा करते,
नाम नारायण हर प्रकरण में,
पल पल प्रभु जी तेरी शरण में।

फूले फले हम तेरी चरण में,
बास करो प्रभु अंतर्मन में,
भक्ति भावना हो जन जन में,
मदन मुरारी सबके मन में।

यदि नाथ की कृपा हो तो,
रघुनाथ की इच्छा हो तो,
लगन राम से बनी रहेगी,
वंदन प्रति पल करते हो जो।

श्यामल विमल स्वरूप निहारूं,
षोडशोपचार कर आरती उतारूं,
संत जन प्रभु के कीर्तन गाए,
हनुमान जी के मन भाए।

क्षत्रिय कुल के देव दिवाकर,
त्रिविध ताप निवारें हरिहर,
ज्ञान धरा को करते पावन,
श्रीधर के कर सौंपा जीवन।

© अमित पाठक शाकद्वीपी

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