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वीर आदिवासी नेता एवं जननायक भगवान बिरसा मुंडा

                        उनका कहना था की "वनवासी नहीं हैं आदिवासी भारत के मूल निवासी हैं"

बिरसा मुंडा एक युवा स्वतंत्रता सेनानी और एक आदिवासी नेता थे। उन्हें 19 वीं सदी के अंत में ब्रिटिश
शासन के खिलाफ एक सशक्त विद्रोह के लिए याद किया जाता है। जिसे अंग्रेजी हुकूमत खार खाती थी। बिहार और झारखंड के आदिवासी इलाकों में जन्मे और पले बढ़े। बिरसा मुंडा के राष्ट्रीय आंदोलन को याद करते हुए वर्ष 2000 में उनकी जयंती पर झारखंड राज्य बनाया गया था। 15 नवंबर को बिरसा मुंडा की जयंती के साथ झारखंड राज्य का स्थापना दिवस भी मनाया जाता है। बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 के दशक में छोटे किसान के एक गरीब परिवार में हुआ था। मुंडा एक जनजातीय समूह था जो नागपुर पठार के( झारखंड) निवासी थे। बरसा जी को 1900 में आदिवासी लोगों को संगठित देखकर ब्रिटिश सरकार ने आरोप में गिरफ्तार कर लिया तथा उन्हें 2 वर्ष का दंड दिया। बिरसा ने अपना अधिकांश बचपन अपने माता-पिता के साथ एक गांव से दूसरे गांव में घूमने में बिताया। वे छोटा नागपुर पठार क्षेत्र में मुंडा जनजाति के थे। 22 वर्ष की कम आयु में ही वह अंग्रेजों की आंखों में इतने खटकने लगे थे कि उन पर 500 का इनाम भी रखा गया था। 9 जून 1900 को रांची जेल में 25 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
“आ जाओ आ जाओ बिरसा कहां छुप गए हो तुम तुम बिन कैसे होगा हमारा नूतन बिहान देश समाज के लिए बलिदान हुए तुम क्रांति वीर कहलाए”
एक युवा आदिवासी क्रांतिकारी के रूप में बिरसा की उपलब्धियां का जश्न दशकों से मनाया जाता रहा है। उनका कहना था–
“यदि हमें देश का वास्तविक विकास करना है तो हमें सभी धर्म व जाति के लोगों को साथ लेकर चलना होगा”
आदिवासी अस्मिता, स्वायत्तता और संस्कृति को बचाने के लिए अंग्रेजों के खिलाफ जंगल जमीन की लड़ाई छेड़ने वाले आदिवासी नेता, महान समाज सुधारक भगवान बिरसा मुंडा जी को विनम्र श्रद्धांजलि!

डॉ मीना कुमारी परिहार ‘मान्या’

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