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समाधि पाद सूत्र– ४४

एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्म विषया व्याख्याता ।

एतया= इसीसे {पूर्वोक्त सवितर्क और निर्वितर्क के वर्णन से ही}; सूक्ष्मविषया= सूक्ष्म पदार्थों मे की जानेवाली; सविचारा= सविचार {और} निर्विचारा= निर्विचार समाधि का; च= भी; व्याख्याता= वर्णन किया गया ।

अनुवाद– इसी सवितर्क निर्वितर्क समाधि के द्वारा सूक्ष्म विषयक सुविचार और निर्विचार समाधि की भी व्याख्या की हुई समझनी चाहिए ।

व्याख्या– जिस प्रकार स्थूल ध्येय विषयों में की जाने वाली समाधि सवितर्क और निर्वितर्क होती है उसी प्रकार सूक्ष्म ध्येय विषयों में की जाने वाली समाधि ‘सविचार’ और ‘निर्विचार’ होती है ।
जब इन सूक्ष्म विषयों में चित्त को स्थिर किया जाता है तो उसके नाम रूप और ज्ञान के विकल्पों का मिला-जुला अनुभव होता है तो उसे ‘सविचार समाधि’ कहते हैं । किंतु जब उनकी अलग-अलग प्रतीति होती है तो इसे निर्विचार समाधि कहते हैं ।

स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार

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