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अनुवाद वैश्विक भाषाओं की आत्मा है

  • डॉ मृदुल कीर्ति (अमेरिका)

साझा संसार फाऊंडेशन की पहल पर, ‘अन्तर्राष्ट्रीय अनुवाद काव्य-पाठ’ ऑनलाइन आयोजन,
डॉ मृदुल कीर्ति (अमेरिका) की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ।

इस आयोजन में सुश्री प्रगति टिपणीस (रूस), सूर्यकांत सुतार ‘सूर्या’ (तंजानिया), डॉ शिप्रा ‘शिल्पी’ सक्सेना (जर्मनी), ऋचा जैन (लंदन), प्रो. माधवेन्द्र प्रसाद पाण्डेय (मेघालय), डॉ प्रदीप त्रिपाठी (सिक्किम), डॉ तारो सिंदिक (अरुणाचल प्रदेश) और डॉ कल्पना पाठक (असम) अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी अनुवाद काव्य-पाठ में भाग लिया।

इस आयोजन का सशक्त एवं सफल संचालन नीदरलैंड से सुश्री अश्विनी केगांवकर ने किया।

डॉ मृदुल कीर्ति ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में सभी अनुदित रचनाओं के काव्य पाठ की सराहना करते हुए कहा कि आज का आयोजन अपने आप में, साझा संसार फाऊण्डेशन द्वारा पहल की एक अद्भुत उपलब्धि है। उन्होंने सभी प्रतिभागियों को उनके द्वारा विभिन्न भाषाओं के हिंदी भाषा में काव्य अनुवाद को सराहा। कीर्ति जी ने 18 महाग्रंथों के दस हजार से अधिक श्लोकों व मंत्रों का तीन भाषाओं – ब्रज भाषा, खड़ी बोली व अवधी भाषा में काव्य अनुवाद किया है। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि अनुवाद आज की प्रचलित भाषाओं में सरस रूप में हो। तभी पाठक अनुवाद की प्रियता, निजता और रुचिता को आत्मसात कर सकेगा।

साझा संसार फाऊण्डेशन के अध्यक्ष रामा तक्षक ने स्वागत वक्तव्य में साझा संसार समूह की स्थापना से अब तक साहित्यिक कार्यकलापों और उपलब्धियों की संक्षिप्त जानकारी दी। उन्होंने अनुवाद कार्य की महत्ता को रेखांकित कर बताया कि वैश्विक साहित्य के अनुवाद से भारतीय साहित्य को समृद्ध करना प्रवासी साहित्यकारों की प्राथमिक जिम्मेदारी है। अनुवाद, मूल लेखक के चित्त के तल पर बैठना है। तभी अनुवाद सही अर्थों में, शब्दों में अभिव्यक्ति पा सकता है।

प्रगति टिपणीस ने रूसी कवि अलेक्जेंडर सर्गेई पुश्किन की रचना ‘स्मारक मैंने अपना बनाया है’, माधवेन्द्र प्रसाद पाण्डेय ने नागलैंड की आवो भाषा की तेमसुला आओ की रचना ‘पृथ्वी के लिए शोक गीत’ तथा खासी भाषी कवि उ सोसो थाम की रचना ‘सुनाला अनाज’, सूर्यकांत तुसार ‘सूर्या’ ने तंजानिया के सुवाहिली भाषी कवि सैफ का गीत ‘ओ मेरी रातरानी, मेरी बंदगी स्वीकार करो’ तथा यूफ्रेज केजिलाहाबी की रचना ‘दोपहर की चाय’, शिप्रा ‘शिल्पी’ सक्सेना ने जर्मन कवि बेरटोल्ट ब्रेख्त की रचना ‘तुम्हारे प्रश्न मर नहीं सकते’, प्रदीप त्रिपाठी ने स्वंय की नेपाली रचना ‘न लौटने वाले वे’ व वरिष्ठ नेपाली कवि सुभाष दीपक की रचना ‘हत्या की कला’, ऋचा जैन ने आयरिश क्रांतिकारी बॉबी सैंड्स की रचना ‘समय की लय’, तारो सिंदिक ने स्वयं की मातृभाषा तागिन लोकगीत ‘ताकार हअ बनअ ङो ना’ का हिंदी अनुवाद, कल्पना पाठक ने मूल असमिया कवि प्रणव कुमार बर्मण की रचना ‘आधा लता मंगेशकर का आधा मोहम्मद रफ़ी का’, का हिंदी अनुवाद सुनाया। सभी की रचनाओं में जीवन की कालातीत बानगी की प्रस्तुति बहुत ही रोचक थी। सभी श्रोताओं ने प्रतिभागियों के काव्य पाठ की जी भर कर सराहना की।

रामा तक्षक

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