
बोझिल पलकें
बिखरी अलकें।
टूटता दंभ।
चल रहा था भीतर
एक अनकहा अंतर्द्वंद्व।
बयां कर रही थीं
कुछ अधूरा-सा सुकून,
मन की चुप आवाज़,
जिम्मेदारियों का बोझ,
भविष्य की चिंता,
टूटता, बिखरता परिवार
विकल, लाचार मन से।
सुख का नन्हा-सा कण
बिखरकर गिर पड़ा था कहीं।
क्षणभर का विराम,
अँधेरे की हल्की नरमी,
थोड़ी-सी शांत पड़ती हवा
सब मिलकर कह रहे थे
एक ही कहानी
झुकी हुई,
बोझिल पलकें।
स्वरचित पुष्पा पाठक छतरपुर मध्य प्रदेश












