
हिमालय के पास एक शांत आश्रम था। वहाँ ऋषि वात्स्यायन बच्चों को शिक्षा देते थे। इस आश्रम में शिक्षा केवल पढ़ने-लिखने की नहीं थी, बल्कि सही सोचने, सही निर्णय लेने और अच्छा इंसान बनने की भी थी। इसी शिक्षा में धिय-संस्कार के बारे में भी ज्ञान दिया जाता था। यह संस्कार बुद्धि को सही दिशा देने के लिए किया जाता था।
एक दिन देवांश नाम का एक बच्चा गुरुजी के पास आया। उसने पूछा — “गुरुजी, धिय-संस्कार क्या है?” गुरुजी बोले — “सिर्फ पढ़ लेना या याद कर लेना बुद्धिमानी नहीं है। असली बुद्धिमानी वह है जो सही-गलत पहचान सके और सही रास्ता चुन सके।” देवांश ने सिर हिलाया और समझने की कोशिश की।
अगले दिन गुरुजी उसे जंगल में ले गए। वहाँ दो रास्ते थे, एक साफ और आसान, दूसरा मुश्किल और कांटों से भरा। गुरुजी ने कहा — “औषधि इनमें से किसी एक रास्ते पर है।” देवांश ने सोचा और फिर कठिन वाला रास्ता ही चुना। वह थोड़ा घायल हुआ, पर औषधि मिल गई। गुरुजी मुस्कुराकर बोले — “सही रास्ता हमेशा आसान नहीं होता, पर बुद्धिमान वही होता है जो सही रास्ता चुनता है।”
कुछ समय बाद देवांश बहुत होशियार हो गया। उसे अपने ज्ञान पर गर्व होने लगा। एक दिन गुरुजी ने कहा — “आज तुम सब बच्चों को पढ़ाओ।” पर जब वह पढ़ाने गया तो उसके घमंड के कारण कोई बच्चे उसे सुनने को तैयार नहीं हुए। वह वापिस दु:खी होकर आया। गुरुजी ने समझाया कि “जहाँ अहंकार होता है, वहाँ ज्ञान की कीमत कम हो जाती है। जीवन में धिय संस्कार विनम्रता से ज्ञान को अति सुंदर बनाता है।”
देवांश को गुरु जी की बात समझ में आ गयीl अब समय बीतता गया और देवांश ने अपने जीवन में धिय संस्कार को समझा और उसके अनुसार अपने जीवन में परिवर्तन करने का प्रयास करते गयाl अनंत: बड़ा होकर वह स्वयं गुरु बन गया। वह हमेशा अपने शिष्यों से कहता कि “ज्ञान हमें तेज देता है, लेकिन धिय-संस्कार हमें सही दिशा देता है” और इस तरह उसकी शिक्षा लोगों तक फैलती गयी और बच्चों को जीवन में सही निर्णय लेने की शक्ति मिलती रही।
योगेश गहतोड़ी “यश”












