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मोक्ष के पथिक (भीतर के दरवाज़े)

राघव अगले दिन भोर में घर लौटा।
पत्नी सुनीता अंगीठी के पास बैठी थी,
उसके चेहरे पर रातभर की चिंता तैर रही थी।
“कहाँ चले गए थे?”
उसकी आवाज़ में झुंझलाहट कम,
घबराहट ज़्यादा थी।

राघव कुछ पल चुप रहा।
कल रात की घटना
नदी, हवा, और वह वृद्ध…
सब किसी सपने जैसा लग रहा था,
पर वह जानता था कि वह सपना नहीं था।
“बस… मन भारी था,”
उसने धीरे से कहा,
“थोड़ी देर नदी पर बैठ आया।”
सुनीता ने उसके चेहरे को ध्यान से देखा।
“कुछ बदले-बदले लग रहे हो।
क्या हुआ है?”
राघव मुस्कुराया,
जो मुस्कान उसने वर्षों बाद महसूस की थी।
“कुछ नहीं…
शायद खुद से थोड़ी मुलाकात हो गई।”
सुनीता ने सिर हिलाया,
मानो वह समझ भी गई हो
और नहीं भी।
राघव अंदर आया,
पर उसके मन में एक अजीब सी शांति थी
जो उसने लंबे समय बाद महसूस की थी।
पर इसके साथ ही
एक और भावना धीरे-धीरे उठ रही थी
पछतावे की।
क्योंकि जब भी मन सच के पास पहुंचता है,
पहला दरवाज़ा पछतावा ही खोलता है।

राघव का अतीत — वो गलती जो कभी स्वीकार न हुई
दिन ढलने तक राघव अपने पुराने घरवाले कमरे में जा बैठा
वही कमरा जिसमें उसने खाट, चौकी और दीवारों पर
अपनी जवानी की आवाज़ें टाँग रखी थीं।
उसकी आँखें दीवार पर लगे
एक धुंधले से फ़ोटो पर टिक गईं
उसके छोटे भाई मोहन का फ़ोटो।

मोहन…
जो करीब 30 साल पहले
जंगल में हुए एक उग्रवादी हमले में मारा गया था।
गाँव में लोगों ने कहा था
“गलत वक़्त, गलत जगह पर था।”
पर राघव जानता था कि यह पूरी सच्चाई नहीं थी।
मोहन उस रात अकेला जंगल नहीं गया था।
राघव भी था उसके साथ।
पर जब हमलावर आए
राघव भाग गया।
और मोहन…
वहीं रह गया।
लोगों ने माना कि मोहन अकेला था।
राघव ने भी यही कहा।
किसी ने उससे पूछताछ नहीं की,
और न किसी को शक हुआ।

लेकिन उसके मन ने उसे कभी माफ़ नहीं किया।
आज इतने वर्षों बाद
वह याद फिर से लौट आई थी।
उसने खुद से कहा
“यही वह बोझ है जिसके कारण मैं रातों को सो नहीं सकता।
यही वह गलती है जो मेरे कानों में फुसफुसाती रहती है।”
राघव अंदर ही अंदर टूट गया।
आँखों से आँसू बहते रहे।
वह फफककर रो पड़ा।
और तभी…
कमरे में एक हल्की हवा चली
बिना किसी खिड़की के खुले हुए।
राघव ने सिर उठाया।
उसने देखा
वही वृद्ध,
वही शांत चेहरा,
वही अनंत आँखें
उसके सामने खड़ी थीं।

यमराज।

“तुम… फिर आ गए?”
राघव काँपती आवाज़ में बोला।
वृद्ध धीरे से उसके पास आ बैठे।
“तुम्हें लगा था कि केवल नदी पर ही सत्य मिलेगा?
सत्य वहाँ मिलता है
जहाँ मन टूटता है।”

राघव ने सिर झुका लिया।
“मैंने… अपने भाई को अकेला छोड़ दिया था।
अगर मैं भागा न होता
तो शायद वह जिंदा होता।”

वृद्ध ने कोई झटका नहीं दिखाया,
न रोष, न दंड।
बस शांति।

“क्या तुम उसे जानबूझकर मरने के लिए छोड़कर भागे थे?”
उन्होंने पूछा।

राघव ने सिर झटका।
“नहीं… डर गया था।
मुझे लगा था कि अगर मैं वहाँ रुका
तो मैं भी मारा जाऊँगा।”
“यही तो मनुष्य की सच्चाई है,”
वृद्ध बोले।
“डर।
डर वह दरवाज़ा है
जहाँ से पाप भीतर आता है—
और पछतावा बाहर नहीं जाने देता।”
राघव कुछ कह न पाया।

“पर एक बात याद रखना,”
वृद्ध ने कहा,
“मोक्ष गलतियाँ न करने से नहीं मिलता।
मोक्ष… गलतियों को स्वीकार करने से मिलता है।
और जहाँ सुधार संभव है,
वहाँ उसे सुधारने से।”

राघव ने सुबकते हुए पूछा
“लेकिन मोहन लौट नहीं सकता।
मैं अब क्या सुधारूँ?”
वृद्ध ने शांत स्वर में कहा
“अपने आप को।
उस एक पल ने तुम्हारा जीवन बदल दिया।
अब उसे फिर तुम्हारे लिए बदलने दो।”
“कैसे?”
राघव ने पूछा।

वृद्ध ने जवाब नहीं दिया।
बल्कि हवा में विलीन हो गए।

पर जाते-जाते
उनकी आवाज़ कमरे में गूँज गई

“अगला कदम तुम्हें खुद उठाना होगा।”

राघव देर तक वहीं बैठा रहा।
उस रात पहली बार उसे समझ आया
पछतावे का दरवाज़ा खुल चुका है,
अब सत्य के रास्ते पर कदम रखना
उसे ही है।
आर एस लॉस्टम

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