
मिट्टी का पुतला था मैं,
मिट्टी में ही मिल जाना था,
चार कंधों की दूरी भर—
बस इतना सा सफ़र निभाना था।
पर सवाल बदन का नहीं,
उस रूह का है जो भीतर थी—
क्या वो भी आग में जल जाएगी?
या राख बन हवा में उड़ जाएगी?
क्या पानी में घुलकर खो जाएगी?
या धरती की तह में सो जाएगी?
या फिर किसी कोने, किसी आहट में,
किसी स्मृति में, किसी चाहत में,
यूँ ही भटकती फिरती होगी—
हम सब के बीच… अनदेखी, अनसुनी।
कहते हैं रूह मरती नहीं,
बस रूप बदलकर बहती है,
कभी धूप बनकर तपती है,
कभी हवा बनकर कहती है—
“शरीर तो लौट जाता है
अपने पंचतत्वों की गोद में,
पर मैं… मैं सफ़र में हूँ अब भी,
किसी नई कहानी,
किसी नए मोड़ में।”
मैं तो मिट्टी में था,
और मिट्टी में मिल गया—
पर मेरी रूह…
अभी कहीं बाकी है,
कहीं पास ही,
कहीं आस ही…
एक अनलिखी दास्तां की तरह।












