
(जंगल की ओर वापसी)
राघव ने रातभर एक पल भी नींद नहीं ली।
उसके भीतर कुछ टूट भी रहा था
और कुछ नया बन भी रहा था।
सुबह का सूरज आँगन में फैला,
पर पहली बार उसे लगा
कि यह रोशनी बाहर नहीं
उसके भीतर कहीं पड़ रही है।
सालों बाद उसने एक कठिन निर्णय लिया
वह उस जंगल में जाएगा
जहाँ मोहन की जान गई थी।
सुनीता की आँखों में सवाल
जब राघव तैयार होने लगा,
सुनीता ने आश्चर्य से पूछा,
“इतने सालों बाद जंगल किसलिए?”
राघव ने सधी हुई आवाज़ में कहा,
“अब डर से बचाकर नहीं रख सकता खुद को।
जैसे मन को साफ़ करता हूँ
वैसे ही अतीत को भी साफ़ करना होगा।”
सुनीता कुछ देर तक उसे देखती रही।
उसे महसूस हुआ कि यह वही आदमी नहीं
जिसे वह इतने वर्षों से जानती थी
नहीं, यह वही था…
बस बदला हुआ,
हल्का हुआ,
और शायद
सहमा हुआ भी,
पर पहली बार सही दिशा में।
“सावधान रहना,”
उसने सिर्फ इतना कहा।
राघव ने सिर हिलाया और चल पड़ा।
जंगल का रास्ता जहाँ पेड़ भी गवाह थे
जंगल वही था,
पेड़ वही थे,
मिट्टी की गंध भी वही।
पर राघव बदल चुका था,
और इस वजह से उसे जंगल
अलग दिखाई देने लगा था।
रास्ते पर पत्तों की सरसराहट
उसे मोहन की हँसी जैसी सुनाई दे रही थी
वही हँसी जो उसने उस रात आख़िरी बार सुनी थी,
जब दोनों साथ चल रहे थे।
जैसे-जैसे वह आगे बढ़ रहा था,
उस रात की परछाइयाँ
एक-एक कर लौटती जा रही थीं।
“भैया, डर लगता है
मोहन ने उस रात कहा था।
“कुछ नहीं होगा।”
राघव ने जवाब दिया था
लेकिन सच्चाई यह थी
कि खुद उसे भी डर लग रहा था।
आज उसी रास्ते पर लौटते हुए
राघव का शरीर काँप रहा था,
पर कदम रुक नहीं रहे थे।
जंगल का वो मोड़ जहाँ सब बदल गया था
राघव उस जगह पहुँचा
जहाँ उस रात गोलियाँ चली थीं।
जहाँ मोहन गिरा था।
जहाँ उसने खुद को बचाने के लिए
उसे अकेला छोड़ दिया था।
जगह आज भी वैसे ही थी
सूखी मिट्टी,
झाड़ी,
और हवा में एक अजीब ठंड।
राघव घुटनों के बल वहीं बैठ गया।
मिट्टी को छूकर बोला
“मैं वापस आ गया हूँ, मोहन…
इस बार भागने नहीं।”
आँसू मिट्टी से मिल गए।
और तभी
पीछे से एक आवाज़ आई
“तुम्हें देर हो गई।
पर देर का मतलब अंत नहीं।”
राघव ने मुड़कर देखा।
वही वृद्ध।
नदी वाले,
कमरे वाले
यमराज।
आज उनका चेहरा पहले से अधिक गंभीर था।
राघव ने रुआँसी आवाज़ में कहा
“मैंने उसे छोड़ दिया था।
मैंने उसे मरने दिया।
मैं डर गया था…
माफ़ कर दो मुझे।”
वृद्ध कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले
“क्या यह सच है कि तुम उसे मरने देने के लिए भागे थे?
या तुम डर के कारण भागे थे?”
“डर… बस डर।”
राघव ने सिर झुका लिया।
वृद्ध ने गहरी साँस ली
“डर पाप नहीं है, राघव।
डर इंसानियत का हिस्सा है।
पाप है
सत्य से भागना।
और तुम जीवन भर भागते रहे।”
राघव ने सिर उठाया।
उसकी आँखों में अब डर कम,
और स्वीकार ज़्यादा था।
“तो अब मुझे क्या करना है?”
उसने पूछा।
वृद्ध ने जंगल की ओर देखते हुए कहा
“जो सत्य तुमने दुनिया से छिपाया,
अब उसे उजागर करना होगा।
मोहन सिर्फ मरा नहीं
उसकी मौत एक कहानी बन गई,
जिसे तुमने अधूरा छोड़ दिया।
अब उसे पूरा करो।”
राघव ने गहरी साँस ली।
पहली बार उसे लगा
सच्चाई का बोझ
मरने का नहीं,
जीने का बोझ होता है।
वृद्ध ने आख़िरी बार कहा
“मोक्ष तभी मिलेगा
जब तुम मोहन की मौत की सच्चाई
उससे जुड़े लोगों को बताओगे।
और खुद को माफ़ करोगे।
इतना कहकर वे धीरे-धीरे धुंध में बदल गए।
जंगल फिर से शांत हो गया
पर राघव का मन
पहली बार वर्षों में
हल्का हो गया।
आज उसने अतीत का सामना किया था।
अब उसे भविष्य का भी सामना करना था।
और उसकी यह यात्रा
अभी शुरू हुई थी।
आर एस लॉस्टम












