
ता एव सबीज: समाधि: ।
ता= वे सब-की-सब ही; सबीज:= सबीज; समाधि:= समाधि हैं ।
अनुवाद– वे सब की सब ही {उपर्युक्त चारो} ‘सबीज समाधि’ हैं ।
व्याख्या– ऊपर सम्प्रज्ञात समाधि का वर्णन किया गया है जिसमें सवितर्क, निर्वितर्क, सविचार तथा निर्विचार समाधियाँ आती हैं ।
पूर्व के सूत्र १७ से आनन्दानुगत तथा अस्मितानुगत समाधि को भी सम्प्रज्ञात समाधि में लिया गया है ।
ये सभी समाधियाँ ‘निर्विकल्प’ तो हैं किंतु यह ‘सबीज’ ही हैं । इनमें वृत्तियाँ बीज रूप में चित्त में विद्यमान रहती हैं । सबीज समाधि तक पहुंचने वाले को कैवल्य लाभ नहीं होता क्योंकि चित्त में वृत्तियों के बीज रह जाने से समय पाकर वे पुनः नए जन्म ग्रहण का कारण बन सकती हैं ।
‘निर्बीज समाधि’ के बाद ही पुनर्जन्म की संभावना समाप्त होती है तथा यही कैवल्य अवस्था है ।
किंतु सबीज समाधि में पहुंचे हुए साधक का पतन नहीं होता । बची हुई साधना अगले जन्म में शीघ्र ही पूरी कर लेता है इस ‘भव प्रत्यय’ कहते हैं ।
यहाँ से आगे अभ्यास समाप्त हो जाता है तथा ईश्वर प्रणिधान, ईश्वर जप और ध्यान से ही निर्बीज समाधि सिद्ध हो सकती है ।
जो ईश्वर में विश्वास नहीं करते शरणागति में जिनका विश्वास नहीं है वह अपने अहंकार को बचा लेते हैं जिससे वे सबीज समाधि से आगे नहीं पहुंच सकते । सबीज से निर्बीज में जाने के लिए अहंकार को गिराना आवश्यक है जो बिना ईश्वर शरणागति के संभव नहीं है ।
स्वयं से ऊपर किसी सत्ता में विश्वास किए बिना अहंकार नहीं गिरता तथा अहंकार गिरे बिना पूर्णत्व नहीं आता । अहंकार की सीमा को तोड़कर ही आत्मा असीम हो जाती है ।
निर्बीज समाधि ही श्रेष्ठ व परम समाधि है । निर्बीज को ही चैतन्य समाधि कहते हैं ।
शून्य समाधि जड़ समाधि है । इसमें जड़ता का बीज रह जाता है ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार












