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पूजा

जब ते, सब पाहन पूजन लागे,
मनवा से जग के डर भागे।

मन माने जब, सब में है ईश्वर,
तब जाने, सब जग नश्वर।

अचर चर में जब वो दिख जावे,
धर्माधर्म में फर्क मिल जावे।

अब कैसे जग के जंजाल से छूटे,
पाप कर्म से नाता कस टूटे।

अंतर द्वंद्व में मन जब हो फंसा,
प्रभु ने उसके मन को कसा।

भरोसा कितना करते हो मुझ पे,
सब कुछ छोड़ के देखो मुझ पे।

मन जब माने तो पत्थर में मैं हूं,
जो न मानो तो ढूंढो मैं कहां हूं।

तब ते, सब पाहन पूजन लागे,
लगन लगी ऐसे मन जागे।
सुलेखा चटर्जी भोपाल

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