
कुछ प्रश्न उठने लगे हैं आजकल —
एक सत्ता ‘ईश्वर’,
जिसके अस्तित्व पर इन दिनों
कुछ ज़्यादा ही सवाल आ रहे हैं
दिमाग़ में।
क्या सच में ईश्वर है?
यदि है —
तो कहाँ है?
क्या उसके भी निर्णय पर
असर हो गया है कलि का?
क्या उसके भी निर्णय
होने लगे हैं पक्षपातपूर्ण?
क्या उसका भी कानून
हो गया है अंधा और बहरा भी?
क्या उसकी अदालत में
दी जाती है तारीख़ पर तारीख़?
और “एक दिन होगा अवश्य न्याय” —
का उथला आश्वासन,
क्या बस एक सांत्वना भर है?
यदि हाँ —
तो यह ईश्वर नहीं हो सकता।
यदि नहीं
तो ईश्वर का न्यायालय कैसा है?
क्या नियम है उसके?
कोई बताए मुझे।
स्यात् ईश्वर है…
पर हो गया है वह भी मनुज सम —
स्वहित में निर्णय करता,
अथवा सब जानते हुए भी मौन रह जाता।
सवाल ईश्वर से नहीं,
उसके मौन से है।
क्या ख़ामोशी ही अंतिम निर्णय है?
यदि नहीं —
तो आख़िर ये खामोशी कब तक
अन्जू अवस्थी












