
है शिशिर, अपने यौवन पर
धुंध में लिपटा, चारों ओर।
हिम आच्छादित हुए शिखर
बढ़ता जाता, ठंड का प्रकोप।
ठिठुरन दिन-ब-दिन बढ़ती जाती
गुनगुनी धूप, तन को सुहाती ।
छत पर चढ़े, लेकर चटाई
सहसा गली में आवाज आई।
ताज गरमा- गरम मूंगफली करारी
गर्माहट तन को देती भारी।
पौष्टिक तत्वों से है, भरपूर
किलो से कम ना लेना हुजूर।
फिर क्या !!
मिल बैठे, सब हमजोली
मूंगफली संग करे हंसी ठिठोली
किस्से कहानियों के दौर बढ़े
तन संग सुकून मन को मिले।
सर्दियों की मुंगफलियां
ले आती, सबको पास।
परस्पर, सौहार्द बढ़ाती
कराती अपनेपन का एहसास।
उर्मिला ढौंडियाल’उर्मि’
देहरादून (उत्तराखंड)












