
रात गहरा चुकी थी। गाँव की पगडंडी पर दूर कहीं झींगुरों की आवाज़ें घुल रही थीं। हवा में मिट्टी की सोंधी गंध थी, पर मन में वही पुराना बोझ जन्म और मृत्यु के बीच ठहर गया अनजाना सत्य।
रामशरण चौधरी चुपचाप चौपाल के किनारे बैठा था। माथे पर महीन लकीरें थीं, मानो जीवन ने अपनी पूरी कहानी उन्हीं पर लिख दी हो। अचानक उसने पूछा
“क्या सच में मोक्ष मृत्यु के बाद मिलता है?”
गाँव के बाकी लोग चुप रहे।
क्योंकि सवाल छोटा था पर उत्तर बेहद लंबा।
रामशरण की आवाज़ फिर उभरी
“लोग कहते हैं कि मरने के बाद यमराज पापों की सज़ा देता है… प्रताड़ित करता है। पर कितना सच है इसमें? क्या सच में कोई गद्दी पर बैठा देवता हमारे पाप गिनता है?”
उसने गहरी साँस ली, जैसे अपने ही भीतर उतरकर कोई जवाब ढूँढ रहा हो।
“मैंने तो देखा है यहाँ ज़मीन पर, इसी मिट्टी पर, उसी गाँव में जहाँ हम जीते हैं
सबसे पहले इंसान ही इंसान को सज़ा देता है।
कभी जाति के नाम पर, कभी सत्ता के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर।
उसकी आँखें दूर अंधेरे में खो गईं।
“अगर कोई पाप है, तो वो यहीं होता है और उसकी सज़ा भी यहीं दी जाती है।
फिर यमराज की क्या ज़रूरत?”
चौपाल में बैठे बूढ़े श्यामलाल ने धीमे से कहा
“बेटा, मोक्ष मरने के बाद नहीं आता।”
वो थोड़ा रुका, जैसे शब्दों को पलट रहा हो।
“मोक्ष तो तब मिलता है, जब मन की गाँठें खुल जाती हैं। जब इंसान खुद को औरों की पीड़ा में देख लेता है।”
रामशरण हँस पड़ा
अगर ऐसा है तो फिर यहाँ कौन बचा है?
हर घर में कोई न कोई मरा, किसी का बेटा, किसी का बाप, किसी की इज़्ज़त, किसी का भरोसा
तो सबको मोक्ष मिल जाना चाहिए था!
इस बार बूढ़े ने उसकी आँखों में देखागहराई से।
“मोक्ष शरीर का अंत नहीं
अहंकार का अंत है।
और अहंकार मरता सबसे आख़िर में है।”
रामशरण चुप हो गया।
उसे लगा, जैसे उसके भीतर कोई पुराना दरवाज़ा खटखटा रहा हो
क्योंकि उसने भी देखा था कि कैसे सत्ता की हवाओं में मानवता डूब गई थी।
कैसे लोग अपने ही गाँव के लोगों को दुश्मन कहकर मार देते थे।
कैसे जो मारा गया वो भी गरीब… और जो मार रहा था वो भी किसी और का मोहरा।
“सब कहते हैं—मरने के बाद न्याय होगा,”
रामशरण बुदबुदाया,
“पर न्याय तो यहाँ कभी हुआ ही नहीं।”
श्यामलाल ने उत्तर दिया
“क्योंकि न्याय करने वाले भी हम ही हैं।
इंसानों की गलतियाँ ही इंसानों को भुगतनी पड़ती हैं।
यमलोक संसार के बाहर नहीं
यमलोक हमारे अपने भीतर है।
ठंडी हवा चली।
चौपाल की लालटेन झिलमिलाई।
रामशरण ने महसूस किया जैसे उसकी भीतरी बेचैनी थोड़ी हल्की हो गई है।
“तो क्या मोक्ष सिर्फ समझ है?” उसने पूछा।
“समझ… और स्वीकार,” बूढ़े ने कहा।
“जब इंसान अपने जीवन को, अपनी गलतियों को, अपने कर्मों को बिना किसी ढोंग के देख सकता है
उसी क्षण मोक्ष का द्वार खुल जाता है।”
रामशरण ने आँखें बंद कर लीं।
उसे लगा—शायद मोक्ष कोई दूर की दुनिया नहीं है।
शायद वो इसी मिट्टी की गंध में छिपा हुआ है।
शायद वही समझ लेना, वही स्वीकार कर लेना…
यही सबसे कठिन परीक्षा है।
और शायद…
यही असली मुक्ति।
आर एस लॉस्टम












