
नदी का किनारा भी अब वीराना सा लगता है,
बहती रेत में हर छोर बहाना सा लगता है।
डर की लहरें जब किनारे को ढहा देती हैं,
टूटकर गिरता हर टुकड़ा फ़साना सा लगता है।
पाँच सौ फ़ीट का घर ही काफी है जीने को,
बाक़ी का सारा हिस्सा बस दिखाना सा लगता है।
**किस डर में, किस चाहत में हम इतने खो जाते हैं
दिल की ख़ाली दीवारों में ताना-बाना सा लगता है।
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क्या सच में जीवन यापन को अहंकार ज़रूरी है?
या बस अपने ही भीतर का बहाना सा लगता है।
जब सन्नाटे को चीरकर आता गहरा सन्नाटा है,
दिल की धड़कन में लहू बनकर तड़पना सा लगता है।
मृत-सा पड़ा जो अस्तित्व था कहीं अंदर,
वही अचानक उठकर फिर से जाग जाना सा लगता है।
आर एस लॉस्टम












