
वक़्त के साथ बहुत कुछ बदलते देखा है ,
हालातों के साथ लोगों को बदलते देखा है ।
कल तक जिनको न थी चिंता मेरी ,
आज अचानक उनको चिंतित सा क्यों देखा है ।
मेरी उदासी पर ख़ुशियाँ जो मनाते थे ,
आज मैं खुश तो उनको रोते हुए देखा है ।
मेरी नाकामी पर जो चैन से सोते थे ,
कदम कुछ आगे बढे तो बैचेन उन्हें देखा है।
कठिन वक्त में भरोसा किया मैंने जिस पर ,
उसी सांई को खुद के साथ खडे देखा है ।
जो भी मिलता है उसी के इशारों से सुनो ,
अपने कामों को उसे निपटाते हुए देखा है ।
डर के तिमिर ने जब जब डराया है मुझे
होंसले का दीप उसको दिखाते देखा है।
अपनों की बेरुख़ी अक्सर रुलाती है मुझे
प्यार से आग़ोश में लेते हुए उसे देखा है ।
जिसके लायक भी न था वो भी दिया उसने मुझे,
दूर मंज़िल तक मुझे पहुँचाते हुए देखा है ।
आज ऐसा क्या हुआ जो मन मेरे हैरान तू ?
लोगों की फ़ितरत यही है जिसको तूने देखा है ।
भूल क्यों जाते हैं लोग छोटी सी इस बात को ,
जिसको ठुकराती ये दुनिया उसे प्रभु को उठाते देखा है ।
संजय राय “साई”
काशी












