
पहचान बनाने को श्रम का कुछ दान सदा करना होगा,
संशय भ्रम अरु अहंकार के ऊहापोह से बचना होगा।।
जिनके तन निर्मल मन निर्मल है,उनकी पहचान स्वयं बनती,
चाहे मार्ग में कितने कंटक हो, नियति स्वयं उनको चुनती।।
निज क्रोध घृणा को त्याग बढ़ो, माया और मोह में न उलझो ,
करके तुम कठिन परिश्रम को अपनी मुश्किल से खुद सुलझो।।
प्रभु ने जो है श्रेष्ठ शरीर दिया इसका सदुपयोग सदा करना ,
फिर लक्ष्य स्वयं हासिल करके अपनी पहचान स्वयं बनना।।
स्वरचित पुष्पा पाठक छतरपुर मध्य प्रदेश












