
विधा -कविता
श्रेणी – प्रेम
रचनाकार -कौशल
तेरी बांसुरी जब बजती है न,
तो मेरी साँसें भी रुक-रुक कर चलने लगती हैं,
जैसे कोई बच्चा माँ की गोद में
पहली बार दूध पीकर सो जाए,
और फिर सपने में भी माँ को पुकारे।
ऐसा ही होता है मुझसे जब तू बजाता है।
मैंने कभी तुझे देखा नहीं,
फिर भी मेरी आँखों में तेरे पैरों की धूल है,
हर बार पलकें झपकती हैं तो लगता है
कोई कंकर मेरे नेत्रों में चुभ गया हो—
वो कंकर तेरा है,
जो गोकुल की गलियों से चलकर
मेरे भीतर तक आ घुसा है।
राधा बनकर मैंने कितनी रातें रोईं,
कितनी सुबहें तेरे नाम की माँग सजाई,
फिर भी तू आया नहीं।
फिर भी तू गया नहीं।
बस यमुना किनारे खड़ा रहा,
हँसता रहा,
और मेरे सीने में एक तीर-सा चुभाता रहा—
जो दर्द देता है,
और उसी दर्द में मुझे जीना सिखाता है।
प्रेम तेरा कोई साधारण प्रेम नहीं,
ये वो आग है जो जलाती नहीं,
भीगो देती है।
मैं मरता हूँ हर पल,
और हर बार मरकर भी
तेरे नाम से फिर जी उठता हूँ।
अगर कभी मेरी देह छूटे,
तो मेरी हड्डियों को पीसकर
बांसुरी बना देना।
फिर जब तू उसमें फूँक मारना,
तो मेरी सारी चीखें, सारी सिसकियाँ,
सारा अधूरा प्रेम
एक लंबी तान बनकर निकले—
ऐसी तान कि सुनकर
सारी सृष्टि थम जाए,
और राधा का नाम लेते-लेते
खुद यमुना भी रो पड़े।
तब शायद तू मुस्कुराए,
और धीरे से कहे—
“अब आया न मेरे पास,
अबकी बार सच में।”
कृष्ण…
बस इतना सा नाम है,
फिर भी मेरे खून में घुल गया है।
हर धड़कन में बस यही पुकार है—
ले ले मुझे,
या मार दे मुझे,
पर इस बीच में मत छोड़ना।
जय श्री कृष्ण।
कौशल












