
निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसाद: ।
निर्विचारवैशारद्ये= निर्विचार समाधि अत्यन्त निर्मल होने पर {योगी को}; आध्यात्मप्रसाद:= आध्यात्मप्रसाद प्राप्त होता है ।
अनुवाद– निर्विचार समाधि अत्यन्त निर्मल होने पर आध्यात्म प्रसाद प्राप्त होता है ।
व्याख्या– इस निर्विचार समाधि के निरन्तर अभ्यास से जब यह पूर्ण शुद्ध हो जाती है तो योगी को आध्यात्म प्रसाद {परमात्मा की कृपा} प्राप्त होता है । आगे निर्बीज समाधि उसी की कृपा से वह उपलब्ध कर लेता है । यहाँ सभी प्रयत्न छूट जाते हैं । ईश्वर कृपा से बचा खुचा मलिनता का बीज भी नष्ट हो जाता है ।
इसी को सम्यक् ज्ञान, ‘सच्चा साक्षात्कार’ आध्यात्म प्रसाद’ कहते हैं । इस अवस्था में योगी की बुद्धि अत्यंत निर्मल हो जाती है ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार












