
देश की आत्मा है हमारे गांव।
कठिनाइयों के समय
ममता की छांव है यह गांव।
कर्मठता का प्रतीक है गांव।
खेत खलिहानों का महत्व बताते ये गांव।
धरती का ऋण चुकाते है ये गांव।
स्वेद कणों का महत्व समझाते ये गांव।
प्रेम भाव, आपसी रिश्ते परिवार की धुरी हैँ, इस समझ का निचोड़ है ये गांव।
भले लोग हमें स्वार्थी कह लें,
आज इस आधुनिकता की होड़ में
इन गांवों को शामिल नहीं करना है।
इनमें हमारा आत्मिक आनंद बसा है,
इन्हें "मिनी शहर " नहीं बनाना है।
सुलेखा चटर्जी












