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मोक्ष की खोज“जो मौत से लौट आया”

चौपाल की रात खत्म हो चुकी थी।
लेकिन रामशरण के मन में जो सवाल उठे थे, वे अभी भी भोर की धुंध की तरह फैले हुए थे अस्पष्ट, पर बिल्कुल सामने।

सूरज अभी उगा ही था कि गाँव में हलचल शुरू हो गई।
औरतें कुएँ पर निकल आईं, बच्चे स्कूल की ओर, और खेतों की तरफ जाते पुरुषों के कदमों में वही रोज़ की जल्दी।
लेकिन आज एक नई खबर हवा में तैर रही थी
“गंगाराम लौट आया है।”
गंगाराम… वही आदमी, जिसे सबने एक साल पहले नदी में डूबा हुआ मान लिया था।
तीन दिन तक उसकी खोज हुई, फिर पंचों ने कहा “बह गया होगा।”
बस, कहानी वहीं खत्म हो गई थी।
बीवी ने सोलहों श्राद्ध कर दिया था, बेटे ने पिता की तस्वीर के नीचे दिए जला दिए थे।
पर आज वही गंगाराम गाँव के बाहर वाले बरगद के नीचे बैठा था
कमज़ोर, दुबला, पर ज़िंदा।

रामशरण तुरंत वहाँ पहुँचा।
गंगाराम की आँखों में अजीब-सी थकान थी जैसे कई जन्मों की नींद एक साथ उसकी पलकों पर आ बैठी हो।
रामशरण धीरे से बोला,
“गंगा, कहाँ था तू? लोग कहते हैं तू
तू मर गया था।”
गंगाराम ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन वो मुस्कान काँप गई।

“मर ही तो गया था, रामू…
उसकी आवाज़ फुसफुसाहट जैसी थी।
“कम से कम दुनिया को तो यही लगा।”
“पर सच क्या है?” रामशरण ने पूछा।
गंगाराम ने आँखें बंद कर लीं, जैसे वो किसी गहरी अँधेरी सुरंग से वापस लौट रहा हो।
मैंने मौत को देखा, रामू
और जो देखा, वो तुम्हें हिला देगा।
ना कोई यमदूत आया,
ना कोई परलोक का दरवाज़ा खुला।
कुछ नहीं

वो थोड़ा रुका।
उसकी साँसें भारी हो गईं।
“बस… एक खालीपन।
इतना गहरा कि उसमें खुद का नाम तक भूल जाओ।
वो जगह… कहीं बाहर नहीं थी।
वो मेरे अंदर थी।
मेरे डर, मेरे पाप, मेरे कष्ट, सब मेरे ही सामने खड़े थे।”
रामशरण के रोंगटे खड़े हो गए।
“क्या मतलब? सच-सच बता।”
गंगाराम की आवाज़ टूटने लगी
“मौत के बाद कोई दंड नहीं मिलता, दोस्त
दंड तो हम अपने ही मन में झेलते हैं।
जिसे लोग ‘यमराज की यातना’ कहते हैं,
वो दरअसल
हमारी अपनी आत्मा का न्याय होता है।
वही सवाल करती है
क्या किया तूने?
किसे दुख दिया?
किसकी रोटी छीनी?
किसकी आंखों में आँसू भर दिए?”
वो आगे झुका और लगभग फुसफुसाया

“और जो जवाब नहीं दे पाता…
वो वहीं अटक जाता है
मैं भी अटक गया था, रामू।”
रामशरण ने पूछा,
“तो वापस कैसे आया?”
गंगाराम ने आसमान की तरफ देखा।
बरगद की पत्तियों के बीच से धूप छनकर उसके चेहरे पर पड़ रही थी।
“क्योंकि मेरे भीतर की सज़ा पूरी नहीं हुई थी।
कुछ अधूरा था।
कुछ ऐसा जो मुझे वापस इस दुनिया में खींच लाया।
जैसे कोई कह रहा हो
‘अभी काम बाकी है।’
और मैं लौट आया।”
दोनों के बीच सन्नाटा फैल गया।
रामशरण ने पहली बार महसूस किया कि शायद मोक्ष कोई पवित्र लोक नहीं…
शायद वो एक यात्रा है, जो भीतर शुरू होती है और भीतर ही खत्म हो जाती है।
गंगाराम ने थकी हुई आवाज़ में कह

“एक दिन मैं फिर जाऊँगा, रामू…
लेकिन इस बार कोशिश करूँगा कि लौटकर ना आऊँ।
क्योंकि लौटना…
सबसे बड़ी सज़ा है।”

रामशरण ने पहली बार महसूस किया
शायद जीवन में सबसे कठिन चीज़ मरना नहीं,
अधूरे जीवन को लेकर वापस लौटना है।

आर एस लॉस्टम

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