
तज्जः संस्कारोऽन्य संस्कार प्रतिबंधी ।
तज्ज:= उससे उत्पन्न होने वाला; संस्कारः= संस्कार; अन्य-संस्कारप्रतिबंधी= दूसरे संस्कारों का बाध करने वाला होता है ।
अनुवाद– इस ऋतंभरा प्रज्ञा से उत्पन्न संस्कार अन्य संस्कारों का प्रतिबंधक {बाध करने वाला है} ।
व्याख्या– जब चित्त की समस्त वृत्तियों की तरंगे शान्त हो जाती हैं तब चित्त अत्यन्त निर्मल एवं अविद्यादि संस्कारों से रहित हो जाता है ऐसी स्थिति में पहुंचने पर साधक की प्रज्ञा ऋतंभरा हो जाती है ।
ऐसी प्रज्ञा के उदय होने पर चित्त में जो वासनागत संस्कार थे जिससे वह निरंतर संसार के भोगों की ओर भागता था
उनका पूर्ण रूपेण बाध हो जाता है ।
ऐसे संस्कारों की तरंगे फिर उठती ही नहीं किंतु इनसे अन्य संस्कार उत्पन्न होते हैं । जो आत्मज्ञान तथा मुक्ति की ओर ले जाने वाले होते हैं । ऐसा व्यक्ति ही सतगुरु वाला होता है । उसमें करुणा, दया, अहिंसा आदि सद्’गुणों का विकास हो जाता है ।
मनुष्य संसार में रहकर भी जो सोचता है, अनुभव करता है तथा कार्य करता है, उन सब के संस्कार चित्त में इकट्ठे हुए रहते हैं । यह ही संस्कार मनुष्य को संसार में भटकने वाले होते हैं ।
जब इनका बाध हो जाता है तो वह मुक्ति लाभ कर सकता है । इस प्रज्ञा से साधक को प्रकृति की पूर्ण ज्ञान हो जाता है जिससे वह आत्मानंद की अनुभूति करने लगता है । यह मुक्तावस्था के समीप की स्थिति है ।
इस प्रज्ञा के बाध होने पर वह प्रकृति से अलग होकर शुद्ध चैतन्य का अनुभव करता है । यही कैवल्य अथवा मोक्ष है ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार












