
विधा : काव्य
छंद : मुक्त छंद
लेखिका : अन्जू अवस्थी
गोधूलि थी वो —
समय की ही नहीं, जीवन की भी।
मानो सूर्य अस्त हो चुका था
ज़हां से उसके।
पर रात्रि?
वो कैसे आती,
जब उसे कोई निमंत्रण ही न मिला
उस शक्ति से,
जो स्वयं बिखर रही थी भीतर।
कैसे देती निमंत्रण वो,
जब उसकी आँखों ने
अब तक ठीक से
उदयांचल की अरुण-लालिमा भी न देखी थी।
हर बार
जब अंधेरा पास आता,
वह चीख उठती —
“नहीं, रात्रि नहीं,
अभी नहीं!”
“अभी तो देखना है मुझे
उगते सूर्य की लालिमा,
पक्षियों का कलरव,
प्रकाश की पराकाष्ठा,
और भी बहुत कुछ…”
बस, इन्हीं सुनहरे स्वप्नों को
भीगी और उदास आँखों में समेटे,
वह अब तक खड़ी है —
गोधूलि की इसी दहलीज पर,
जहाँ भीतर और बाहर की दुनिया में
एक मौन युद्ध जारी है।
अन्जू अवस्थी (शोधच्छात्रा)












