
धरती की धड़कन सुनो, बदल रहा है मिज़ाज,
कभी बाढ़, कभी सूखा—प्रकृति का है ये राज।
पिघलते हैं हिमशिखर, बढ़ता है समुंदर,
लापरवाह इंसान बने खुद अपने ही बंदर।
हरित आवरण घटता, कटते हैं जंगल,
साँसों को तरसते हैं पंछी और संबल।
धरती कहती है अब—“बस करो अत्याचार,
सहेज लो मेरी साँसें, वरना होगा संहार।”
छोटा कदम भी बड़ा परिवर्तन ला सकता है,
पेड़ लगाओ, पानी बचाओ, यही संदेश बताता है।
भविष्य सुरक्षित होगा जब चेतना जागेगी,
धरती माँ की गोद फिर से हरियाली से सज जाएगी।
डाॅ आरती वाजपेई असि.प्रोफेसर
लखनऊ उ.प्र












