
दूरदर्शन, दूरदर्शन, यादों का वो मीठा संसार,
श्याम-श्वेत पर्दा था, पर रंगों की थी भरमार।
आवाज़ गूंजे ‘ट्यू-ट्यू’, इंतज़ार घंटों का,
एक ही चैनल पर, थी दुनिया अपनी शानदार।
रविवार की सुबह, ‘रामायण’ की धुन बजती,
सड़कें हो जाती थीं सूनी, हर आँख वहीं सजती।
‘महाभारत’ के श्लोक, ज्ञान की गंगा बहती,
घर-घर में संस्कृति की, एक नई जोत जलती।
‘चित्रहार’ के गाने, ‘रंगोली’ की मस्ती,
‘बुनियाद’ और ‘हम लोग’, कहानियाँ सच्ची।
‘मालगुडी डेज़’ की सादगी, ‘विक्रम और बेताल’ की हस्ती,
‘शक्तिमान’ की शक्ति पर, जान हमारी बसती।
वो एंटीना घुमाना, सिग्नल को लाना,
‘कृषि दर्शन’ का कार्यक्रम, और समाचारों का आना।
ख़बरें पढ़ती नीलम शर्मा, वो चेहरा जाना-पहचाना,
‘मील-सुर मेरा-तुम्हारा’, सबको था गुनगुनाना।
दूरदर्शन, दूरदर्शन, यादों का वो मीठा संसार,
वो सादगी का दौर, वो सुकून कहाँ अब,
दूरदर्शन की यादें, दिल में हैं ज़िंदा सब।
रीना पटले, शिक्षिका
जिला -सिवनी, मध्यप्रदेश












