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मन की कोमल अग्नि


कोमल मन, कठोर हृदय, तन बिल्कुल मोम-सा है
उसमें करुणा, दया और प्रेम का अविरल प्रवाह-सा है।

जो आँसू से भी नाज़ुक है, मगर दुखों में चट्टान-सा,
रिश्तों की तपिश में पिघल जाए, पर सत्य पर अडिग भगवान-सा।

दिल में दुनिया के हर प्राणी के लिए एक कोना बसता है,
नफ़रत की आंधी में भी उसके भीतर सौम्यता का दीपक जलता है।

कभी शब्दों में मरहम बनता है, कभी चुप रहकर भी सहता है,
हर चोट को अपने अंदर समेटे, फिर भी मुस्कान में ढलता है।

उसकी संवेदना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति है,
वो टूटकर भी जुड़ जाता है यही उसकी सबसे बड़ी भक्ति है।

ऐसा मन, ऐसा हृदय, ऐसा तन
जहाँ प्रेम ही धर्म है और मानवता ही जीवन।

आर एस लॉस्टम

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