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शब्दों से परे प्रेम


मैं प्रेम को लिखने चला था पर वो न लिखन को।
खुद दूर चला जाता था हर बार मेरे मन को।

शब्दों में समाने से इंकार किया उसने,
कैसे मैं बाँधूँ एक दरीचा उस सावन को।

काग़ज़ पे उतारूँ क्या, दिल में जो धड़कता है,
कैसे स्वर दूँ उस खामोशी को, उस कंपन को।

मैं ढूँढ रहा था दुनिया भर में उसका चेहरा,
पर प्रेम मिला भीतर ही छूकर जीवन को।

लिखना था प्रेम मगर पलकों ने रोका बार-बार,
जैसे वो खुद लिखता जाता मेरी धड़कन को।

Lostom ये राज़ तभी समझा मैं,
प्रेम नहीं लिखते—प्रेम लिखता है इंसान को हर क्षण को।

आर एस लॉस्टम

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