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गाँव में परछाइयों का लौटना

गंगाराम की वापसी ने पूरे गाँव को हिला कर रख दिया था।
औरतें कुएँ पर फुसफुसाकर बातें कर रही थीं—
“मरकर लौट आया है… जरूर कोई संकेत होगा।”
कुछ बूढ़े लोग कह रहे थे—
“ऐसा तो तब होता है जब किसी का कर्म अधूरा रह जाए।”

पर बच्चों और मर्दों के मन में डर था।
क्योंकि गाँव ने पहले भी अजीब घटनाएँ देखी थीं—
हत्या, दंगे, आग, नदियों का बहाव बदल जाना,
और कभी-कभी ऐसे रहस्य जिनके पीछे किसी तर्क की गुंजाइश नहीं बचती थी।

गंगाराम से मिलने के बाद रामशरण का मन एक अजीब बेचैनी से भरा था।
उसके शब्द—
“वापस लौटना ही सबसे बड़ी सज़ा है…”
बार-बार उसके कानों में गूँज रहे थे।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं थी।

उस रात गाँव में कुछ अजीब हुआ।

मोक्ष की खोज
रात की हलचल

मिट्टी के रास्ते पर एक बूढ़ी औरत रोती-चिल्लाती दौड़ती आई
“किसी को आवाज़ दे दो… मेरे आँगन में कोई है!”
लोग लाठी लेकर उसके घर की तरफ भागे।
रामशरण और गंगाराम भी पहुँचे।
आँगन में अंधेरा था,
पर धुएँ की हल्की गंध थी
मानो किसी ने अभी-अभी चूल्हा जलाकर बुझाया हो।

बूढ़ी औरत काँपती आवाज़ में बोली
“मैंने साफ देखा एक परछाई मेरे पति जैसी…
जो पाँच साल पहले दंगे में मारे गए थे।”
सब लोग असमंजस में पड़ गए।
गंगाराम चुप खड़ा था।
उसके चेहरे पर कोई डर नहीं सिर्फ एक अजीब समझ।
रामशरण ने पूछा,
“तूने कुछ देखा क्या?”
गंगाराम ने धीरे से कहा
“परछाईंयाँ कभी बाहर नहीं आतीं, रामू…
वे हमारे अंदर छिपी होती हैं।
कभी-कभी हम खुद उन्हें बाहर बुला लेते हैं।”
लेकिन तभी
पीछे वाले खेत से आवाज़ आई।
जैसे कोई सूखी पत्तियों पर चल रहा हो।
लोग उधर भागे।
पर वहाँ कोई नहीं था
सिर्फ धान की फसल हवा में झूम रही थी,
जैसे उनके जाने को चुपचाप देख रही हो।
तभी रामशरण को कुछ चमकता दिखा।
उसने झुककर देखा
मिट्टी में एक पैरों का निशान था।
निशान बड़ा अजीब था
नंगे पाँव का भी नहीं, और जूते का भी नहीं।
जैसे कोई बहुत लंबा आदमी वहाँ खड़ा होकर चला गया हो।
रामशरण और बाकी लोग हैरान थे।
पर गंगाराम की आँखों में एक गहरी उदासी उभर आई।
“ये तो होने ही वाला था उसने धीमे से कहा।
“क्या होने वाला था?” रामशरण ने पूछा।
गंगाराम ने अपना सिर उठाया और बोला
“जब कोई मौत से लौटता है…
तो उसके पीछे सिर्फ वो नहीं आता।
उसके साथ वे भी लौटते हैं…
जिनकी कहानियाँ अधूरी हैं।”
हवा की सरसराहट एकदम तेज हो गई।
लोगों के दिल धड़कने लगे।
गंगाराम आगे बोला
“और गाँव में बहुत-सी कहानियाँ दबी पड़ी हैं, रामू…
बहुत-से लोग बिना न्याय पाए मरे हैं…
बहुत-सी आत्माएँ अपने जवाब तलाश रही हैं।
और जब तक वे जवाब नहीं मिलते
इस गाँव की रातें शांत नहीं होंगी।”
रामशरण की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।
यह कहानी अब सिर्फ मौत से लौटने की नहीं रही थी।
अब यह उन सभी परछाइयों की कहानी बनने वाली थी
जो अपनी सच्चाई कहने के लिए फिर से लौट रही थीं।
और शायद
इस बार गाँव सच से बच नहीं पाएगा।

आर एस लॉस्टम

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