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मोक्ष के पथिक परछाइयों की रात

कबूलनामे की रात के बाद गाँव पर एक गहरी चुप्पी छा गई थी।
हरिचरण की स्वीकारोक्ति जैसे किसी पुराने कुएँ की तलहटी से उठकर हवा में फैल गई। लोग अपने घरों को लौट गए, पर उनके दिल रात भर नहीं सोए। जिस कुएँ ने गोधन की लाश निगली थी, आज पहली बार उस कुएँ ने सच उगला था।
गंगाराम देर तक वहीं बैठा रहा।
बरगद की शाखाएँ हिलती थीं,
और हवा में अनजानी सिसकियाँ तैरती थीं —मानो गाँव का हर पाप मिट्टी की दरारों से बाहर झाँक रहा हो।

हरिचरण को पकड़कर ले जाया गया… और रात हुई और भारी।

रामशरण ने घर पहुँचकर पूछा,
“गंगा… आज जो हुआ, उससे लगता है कि सब ठीक हो जाएगा?” गंगाराम ने शून्य में ताकते हुए कहा,
“ठीक?सच सामने आया है, रामू…
लेकिन सच के साथ परछाइयाँ भी लौटती हैं।”रामशरण ने चौंककर पूछा“कौन-सी परछाइयाँ? ”गंगाराम का चेहरा बुझा हुआ था, जैसे उसकी आँखें किसी और दुनिया की रोशनी देख आई हों। वह धीमे स्वर में बोला
“जब कोई आदमी हिंसा से मरता है,
उसकी आत्मा चैन से नहीं जाती।
गोधन अकेला नहीं था, रामू…
इस गाँव की मिट्टी कई वर्षों से चीखें दबाए बैठी है। आज एक आवाज़ सुनी गई…अब बाकी आवाज़ें भी लौटेंगी।”आँगन में बैठे लोग सिहर उठे। एक बूढ़ी औरत, जिसका पति सालों पहले रहस्यमय हालात में मरा था, डरते हुए बोली—“तो क्या… वो आज लौट आया था?क्या वही परछाई मेरे दरवाज़े पर थी?” गंगाराम ने उसकी ओर देखा; उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी करुणा थी—“दाई… परछाई आपके पति नहीं थे। वो थे आपके भीतर के डर, आपके भीतर का अधूरापन।” बूढ़ी औरत फूट पड़ी।

रामशरण की बेचैनी
रामशरण ने पूछा—“गंगा, तू मरकर लौटा है…लेकिन ये परछाइयाँ कैसे लौटती हैं?”गंगाराम का चेहरा और उदास हो गया। उसने कहा—
“मरने के बाद शरीर नहीं भटकता पछतावे भटकते हैं। जहाँ दर्द दबाया जाता है, वहाँ परछाइयाँ लौट आती हैं।” एक लड़के ने पूछा—“तो दाई के पति का भी कोई अधूरा दर्द था?”

गंगाराम ने सिर हिलाया।
“हर मौत में थोड़ी अधूरी बातें होती हैं।
पर कुछ जगहों पर वो बातें इतने सालों तक दबी रहती हैं कि…रात के अँधेरे में आवाज़ बनकर उभर आती हैं।” बरगद के पेड़ ने अचानक तेज़ सरसराहट की। लालटेन काँपी।
हवा ने जैसे लोगों की गर्दन छूकर कहा —“सुन रहे हो?”

गाँव की आत्मा जाग रही थी

गंगाराम ने धीरे से कहा—“आज रात… कई घरों में परछाइयाँ उठेंगी। ये गाँव बहुत वर्षों से सच से भागता रहा है।
अब भाग नहीं पाएगा।” रामशरण के हाथ काँप गए। “मतलब… इसका अंत नहीं हुआ?”गंगाराम ने उसकी आँखों में देखा—“नहीं, रामू। हरिचरण गिरा है, लेकिन पाप जड़ से नहीं उखड़े।
जिन लोगों ने सालों तक इस गाँव को बाँटा,जाति और सत्ता ने जिन। आत्माओं को कुचला…वो सब लौटकर आएँगी।”तभी—दूर पहाड़ की तरफ़ से एक लंबी, कराहती हुई आवाज़ उठी।औरतें सहमकर घरों में घुस गईं। बच्चे रोने लगे।
रामशरण के रोंगटे खड़े हो गए।
गंगाराम ने फुसफुसाया—“शुरुआत हो गई है… आज की रात सिर्फ कबूलनामे की रात नहीं थी…ये परछाइयों के लौटने की रात है।”
अँधेरा गाँव पर और घना हो गया।
कुएँ के पास की लालटेन एक पल को बुझी—और ऐसा लगा मानो दशकों का दबा इतिहास अँधेरे से बाहर निकलकर गाँव की चौखट पर आ खड़ा हुआ हो।

आर एस लॉस्टम

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