
आज इत्तेफ़ाक़ से जब वह
सामने आए,
हृदय स्पंदित हुआ, कदम कुछ
लड़खड़ाए।।
लव थरथराए, नेत्र भी सजल
हो गए,
गिले–शिकवे भूल दोनों
न जाने कहाँ खो गए।।
देखते थे एक दूजे को,
पर संतुष्टि नहीं होती थी,
पुरानी खट्टी–मीठी यादें
दिल में टीस देती थीं।।
कहते थे एक दूजे से—
अहम छोड़कर गले लगो,
कुछ हम संभलें, कुछ तुम संभलो,
गलतियाँ दिल से माफ करो।।
अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा,
एक दूजे का सम्मान करो,
इत्तेफ़ाक़ से मिलन हुआ है
इसको ईश्वर का एहसान करो।।
आज फिर लगा जैसे रिश्तों में
नया सा उजास उतर आया,
सालों बाद सिमटा दर्द,
जैसे सावन बनकर मुस्काया।।
काँपते स्वर में पूछा उसने—
“कैसी हो?” अब ठीक हो ना,
उत्तर केवल इतना निकला
तेरे बिन अब कैसा जीना।।
चलते–चलते हाथों ने
हाथों को सहला डाला,
लगता था जैसे बिछड़ापन
आज पिघलकर फिर से संभला।।
जो बातें अधूरी रह गई थीं,
आज वे फिर पूरी होने लगीं,
लगा टूटी मुक्ता माला
लड़ियां फिर पिरोने लगी।।
पुष्पा पाठक, छतरपुर (म.प्र.)












