
“गाँव की साँसें और गंगाराम का नया दंश”
हरिचरण को जब चौपाल से ले जाया जा रहा था,गाँव में एक अजीब-सी खामोशी फैल गई।जैसे लोग न्याय की आहट से तो सहमे थे, पर सच के बोझ से हादसा भी महसूस कर रहे थे।
गंगाराम ने आसमान की ओर देखा।
बरगद के पत्तों की सरसराहट अब डर नहीं,बल्कि किसी पुराने ऋण के उतरने जैसी लग रही थी।
गाँव की स्त्रियों की पुकार
उसी समय गोधन की माँ—जो अब उम्र और दुख से लगभग पत्थर हो चुकी थी—धीरे-धीरे आगे आई।
वह बोली नहीं।
सिर्फ हरिचरण को जाते हुए देखा,
और फिर मिट्टी को छूकर कहा—
“अब मेरा बेटा इस गाँव में चैन से सोएगा।”
लोगों की आँखों में नमी तैर गई।
कई जो पहले हरिचरण के डर से चुप थे,आज पहली बार खुद को हल्का महसूस कर रहे थे।पुराना कुआँ — मानो सांस ले रहा थाकुएँ के पास हल्की-सी रोशनी फैली। लालटेन कुछ तेज जल उठीगंगाराम ने महसूस किया कि गोधन की बेचैनी अब शांत होने लगी है।
एक धीमी हवा आई।
और ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा हो—न जाता हुआ आदमी, न भूत…बल्कि एक धन्यवाद की छाया।गंगाराम ने आँखें बंद कर लीं—“अब तू चैन में रह, गोधन,”
उसने धीरे से कहा।
रामशरण की बेचैनी
पर रामशरण चुप था। उसकी आँखों में डर था—“गंगाराम भइया… यह सब कैसे हो रहा है? आपको कैसे पता चलता है कि कौन क्या छुपा रहा है?”गंगाराम मुस्काया नहीं। बस थका हुआ-सा बोला—“जब कोई इंसान अधूरी मौत मरता है,
उसकी आवाज़ मिट्टी में कैद हो जाती है। मैं बस… सुन सकता हूँ।”
रामशरण सहम गया।
उसने आज पहली बार महसूस किया कि गंगाराम मौत से लौट तो आया है,
पर अपने साथ कुछ अदृश्य ऋण लेकर आया है।थाने की ओर बढ़ता काफिला हरिचरण को पुलिस ने जीप में बैठाया।उसका चेहरा अब वो मुखिया वाला नहीं, एक साधारण, डरा हुआ अपराधी था जो शायद पहली बार अपनी असलियत से मिला था।
मास्टर जगदीश ने गंगाराम से कहा—
“अब आगे गाँव को सँभालना पड़ेगा।
सिर्फ एक कबूलनामा काफी नहीं
सिस्टम भी बदलना पड़ेगा।”
गंगाराम ने धीमे से सिर हिलाया।
पर कहानी खत्म नहीं होती
जीप ने जैसे ही मोड़ पार किया,
गंगाराम को लगा कि कुएँ की दिशा से
एक और आवाज़ आई“ एक और है…”वह चौंक गया।गोधन की आत्मा शांत हो चुकी थी। तो यह कौन?
उसने ध्यान से सुना
और उसकी रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई। वो आवाज़ बहुत धीमी थी,
पर साफ़—“…मुझे भी दफनाया गया था… उसी रात… उसी ज़मीन पर…”गंगाराम के पैरों तले की धरती अचानक भारी लगने लगी।क्या गाँव में सिर्फ एक ही गुनाह था?या यह कहानी कई साल पुरानेएक और दबे सच की परत खोलने जा रही थी?
रामशरण ने डर से पूछा
“क्या हुआ भइया?”
गंगाराम ने गहरी साँस ली
“रामशरण… गोधन अकेला नहीं था।
उस रात… कोई और भी मरा था।”
चौपाल पर बैठे लोग एक पल के लिए स्तब्ध रह गए।बरगद का पेड़ फिर से हिलने लगा,और कुएँ से निकली हवा इस बार ठंडी नहीं,बल्कि कटीली थी—जैसे कोई पुराना, दफनाया हुआ सचकब्र से करवट ले रहा हो।
आर एस लॉस्टम












