Uncategorized
Trending

ख्वाबों का वो घर


मैंने देखा था एक ख्वाब,जब मेरा अपना घर होगा,

तो पक्का नहीं…एक कच्चा-सा प्यारा घर होगा ।

जिसकी छत पर छप्पर हो,दीवारों में बड़ी-बड़ी झिरकियां हों,

जिनसे बरसता पानी मैं तसल्ली से देख सकूं—
जैसे आसमान अपनी कहानियाँ उतार रहा हो।

जब मायका छोड़कर पति के संग चली,

तो सचमुच वैसा ही नज़ारा मिला…

एक सुंदर-सा घर,
बिलकुल वैसा ही जैसा मैंने चाहा था

सपनों में था कच्चा घर, छप्पर ऊपर छाँव,
साजन संग कट जाएँ, जीवन के सब घाव।

झिरकी से बरसात को, नैनन देखत जाएं,
टप-टप गिरती बूँद में, मन मधुबन मुस्काएं।

मैंने चाहा बिल्कुल वो, सरल सुहाना द्वार,
ईंटों में भी प्यार था, मिट्टी में भी इकरार ।

मायका छोड़ चली जब, दिल में था संकोच,
सपनों जैसा घर मिला, बदली जीवन-ओट।

प्रियतम का वह प्रेम , मायके की वह छाँह,
मीठे पलों की महक में, भर गया हर माह।

देहरी पर बैठी मैं, संग हवा के बोल,
सपनों की दुनिया में था, साजन मेरा अनमोल ।।

प्रतिभा दिनेश कर

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *