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ये आखिरी महीना “दिसंबर”


शीर्षक – “जाता हुआ दिसंबर”
विधा – कविता

खामोश खड़ा है आँगन में यह, जाता हुआ दिसंबर।
दरवाज़े पर दस्तक देती, करवट लेती जनवरी।
​ठिठुराती रातें और लम्बी चाँदनी की स्याही,
साल के पन्ने पलटे, हिसाब कर ले अब तो भाई।

धुंध की चादर ओढ़े, सूरज भी देर से आया,
पुरानी यादों को बस मन में उसने फिर जगाया।
​बीते साल की धूल झाड़कर, नई उम्मीदें बुनता,
सौगातों से भरा है यह नहीं किसी की सुनता है।

​कुछ सपने अधूरे रहे, कुछ बातें रही अनकही,
कुछ हासिल हुआ, कुछ खोया दिया, जिंदगी यूं ही चलती रही।
अब अलविदा कहने को तैयार है ये महीना,
जा रहा है लेकर अपने संग हर ग़म का नगीना।

​घड़ी की सुइयों ने, वक्त को देखो कैसे बाँधा,
तैयारी है नए सवेरे की, अब रखना है कांधा।
​आख़िरी चाय की चुस्की और गर्म अलाव का साथ,
बस चंद दिनों का मेहमान, छोड़ जाएगा ये हाथ।

फिर कैलेंडर बदलेगा, नई तारीख़ें आएँगी,
इंतज़ार में होंगी खुशियाँ ,जो मुस्कुराएँगी।
​आओ मिलकर स्वागत करें उस नई सुबह का,
और करें शुक्रिया इस जाते हुए दिसंबर का।

       रीना पटले (शिक्षिका)
  शास. हाई स्कूल ऐरमा (कुरई)      
     जिला- सिवनी मध्यप्रदेश

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