
सुरंग में गंगा के सामने खड़ी वह परछाईं
धीरे-धीरे धुँध में बदलने लगी—
जैसे उसका अस्तित्व
सिर्फ एक चेतावनी देने आया हो।
गंगाराम ने लालटेन कसकर पकड़ी
और सुरंग से बाहर निकलने लगा।
जैसे-जैसे वह प्रकाश के करीब आता गया,
अंधेरा पीठ पर पंजे मारता महसूस हुआ—
मानो सुरंग उसे वापस खींचना चाहती हो,
जैसे अभी बहुत-सी बातों का उजाला होना बाकी हो।
जब वह बाहर पहुँचा
तो गाँव वाले चौकन्ने खड़े थे।
सबकी आँखें सवालों से भरी हुई।
रामशरण दौड़कर आया—
“गंगा! क्या देखा तूने?
कौन-सी परछाईं थी?
क्या कोई आत्मा—”
गंगाराम ने अचानक उसका हाथ पकड़ लिया।
आवाज़ धीमी लेकिन काँपती हुई
“चुप…
वो बात गाँव के बीच नहीं कही जाती।”
भीड़ सन्न हो गई।
गंगा ने चारों ओर देखा—
हर चेहरा जैसे कुछ छुपा रहा था।
हर आँख में इतिहास का बोझ था।
उसे एहसास हुआ—
सच सुरंग में नहीं,
यहीं इन चेहरों के बीच दबा है।
१. पहला नाम—दुलारीन साहू
गाँव की सबसे उम्रदराज़ औरत दुलारीन।
जो हर मुसीबत पर कहती थी—
“सब ठीक हो जाई, बेटा।”
लेकिन जैसे ही गंगाराम ने सुरंग की बात कही,
वह अचानक घुटनों के बल बैठ गई।
उसके हाथ काँप रहे थे।
“गंगा…
काली मोतियों की माला का नाम मत लेना…वो समय…
हमसे एक गलती हो गई थी…”
रामशरण चौंक गया—
“काकी! कौन-सी गलती?”
दुलारीन की आँखें भर आईं—
“चुन्नी की चीखें… मैं सुन रही थी…
पर बाहर नहीं आई…क्योंकि डरती थी…कि अगर मैंने दरवाज़ा खोला—
तो मेरा भी वही हाल होगा।”
भीड़ खामोश।
कुछ लोग नजरें चुराने लगे।
गंगा ने नरमी से पूछा—
“उसे मारा किसने था, काकी?”
दुलारीन ने जमीन की ओर देखा—
“वही दो मुखिया परिवारों के लोग…
जिनका नाम आज भी कोई नहीं लेता।”
गाँव में बेचैनी फैल गई।
कुछ लोग दुलारीन के पास न जाने क्या कहकर उसे चुप कराने लगे।
गंगाराम ने उन्हें हटाया—
“सच किसी की मर्ज़ी से नहीं रुकता।”
२. दूसरा नाम—बिरजू ठाकुर
भीड़ में से एक लंबा, दुबला,
सूखी आँखों वाला आदमी आगे आया—बिरजू ठाकुर।
जिसकी आँखें हमेशा जमीन देखकर चलती थीं।
“गंगा…”
उसकी आवाज़ कच्ची, टूटी—
“मैंने उस रात आग लगते देखा था…”
गाँव में हलचल हुई—
“अरे ये तो बच्चा था तब!”
“इससे क्या याद होगा?”
गंगाराम बोला—
“बच्चों को सबसे ज्यादा याद रहता है।
क्योंकि उनमें झूठ का बोझ नहीं होता।” बिरजू ने काँपते हुए कहा—
“मैंने… दो परछाइयाँ देखी थीं।
एक हाथ में मिट्टी का तेल…
दूसरे के हाथ में…
लाठी।” गंगा ने पूछा—“चेहरे पहचान में आए?”बिरजू ने सिर हिलाया—
“नहीं…पर कपड़े…
कपड़ों पर बनी वो खास सिलाई—
वो मैंने पहचान ली थी।”
गाँव का एक नाम उसके होंठों पर आने वाला था
पर तभी भीड़ में से किसी ने उसे धक्का दिया।
“चुप!
कुछ बातें भूल जानी चाहिए!”
गंगाराम ने एक कदम आगे बढ़कर
धक्का देने वाले व्यक्ति को रोक लिया
“तुम डर क्यों रहे हो?
सच का नाम लेने से कौन मरता है?”
वह आदमी तमतमा गया, पर चुप रहा।
३. तीसरा चेहरा—माली चाचा की आँखें
गाँव का माली—मुश्किल से बोलता था, पर उसकी आँखें हमेशा
किसी पुराने अपराध की गवाही देती थीं। गंगाराम ने उसकी ओर देखा—
“चाचा… आप उस रात वहाँ थे।
आपने क्या देखा?”
माली के सूखे होंठ हिले—“मैंने…
किसी को चीखते नहीं देखा…
किसी को भागते नहीं देखा…
मैंने तो बस…
अगले दिन राख देखी…और राख में…
एक बच्ची की गुड़िया।”
गाँव के लोगों की साँसें अटक गईं।
गंगा फुसफुसाया—“तो चुन्नी अकेली नहीं थी?”माली चाचा की आँखों से आँसू बह निकले। “नहीं…उसके साथ…कोई और भी था…”
४ गाँव की हवा बदलने लगी*
गंगाराम ने महसूस किया—
पहाड़ी की सुरंग से आने वाला अंधेरा
अब गाँव की दीवारों में भी फैलने लगा है।
लोगों के चेहरों पर छिपा इतिहास
धीरे-धीरे सतह पर आ रहा था।
अचानक—उसी पहाड़ी दिशा से
तीसरी, सबसे लंबी
और सबसे दर्दनाक कराह उठी।
इस बार आवाज़ में
सिर्फ दर्द नहीं, क्रोध भी था।
लोग दहशत में घरों के भीतर भागने लगे।बच्चे रोने लगे। बूढ़े काँपने लगे।
गंगाराम ने आकाश की ओर देखा—
“अब परछाइयाँ सिर्फ दिखेंगी नहीं…
नाम भी माँगेंगी।”
रामशरण ने डरते हुए पूछा
“गंगा… अब क्या होगा?”
गंगाराम ने धीरे से जवाब दिया
“अब गाँव का असली अतीत
अपनी कब्र से बाहर आएगा।
और जो नाम उस रात के पीछे थे—
उनकी नींद…अब खत्म हो जाएगी।”
उसके शब्द पूरे भी नहीं हुए थे कि—
गाँव के उस सबसे बड़े
पुराने, सुनसान मकान में
अचानक एक दरवाज़ा
अपने आप
तेज़ धमाके से खुल गया।
आर एस लॉस्टम












