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गोदना

छत्तीसगढ़ी कविता

मोर गांव के बहिनी, गोदना गोदवाए रे,
सुई के चुभन मा, सपना सजाए रे।
हाथ पांव मा चित्र, जइसे फूल खिले रे,
छत्तीसगढ़ के परंपरा, मन ला भाए रे।

काले रंग के निशान, जीवन के कहानी रे,
दुख सुख के साथी, ये गोदना के निशानी रे।
मां के हाथ से गोदे, बाप के नाम से रचे रे,
गांव के मेला मा, सबके मन लुभाए रे।

चंदन जइसे महके, गोदना के डिजाइन रे,
ट्राइबल के संस्कृति, ये अमिट निशान रे।
प्यार के प्रतीक ये, शादी के साज रे,
दुनिया देखे आश्चर्य, मोर छत्तीसगढ़ के राज रे।

समय के साथ ना मिटे, ये गोदना के रंग रे,
पीढ़ी दर पीढ़ी, विरासत के संग रे।
बहिनी के सुंदरता, गोदना से बढ़ाए रे,
छत्तीसगढ़ी गौरव, सबके मन बसाए रे।

रचनाकार
“कौशल”

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