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बेचैनी

तुम बेचैन कर देती हो, जब भी याद आती हो,
रहूँ जिस हाल में कहीं भी, माथा फिरा देती हो।

सोचों की कड़ी टूटे तो, चुपके से मुस्काती हो,
सन्नाटे से भरे दिल में, हलचल-सी मचा देती हो।

नींदें मुझसे रूठ जाती हैं, रातों को सवाल बनाती हो,
ख़्वाबों की वीरानी में, तुम रौशनी-सी जगा देती हो।

मैं संभलने जो भी चाहूँ, कोई राह नहीं मिलती,
हर कोशिश के दरमियाँ, तुम खुद को बढ़ा देती हो।

ख़ामोशी जब ओढ़ लेती है, दिल अपना बोझ छुपाकर,
बिन दस्तक के आकर तुम, हर बात कहा देती हो।

अब शिकायत क्या हो इस दिल की हालत से,
तुम सामने आकर ही तो, सब कुछ भुला देती हो।

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