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मकर संक्रांति

सूरज जब उत्तर की ओर बढ़े,
आशाओं के दीप फिर से जलें।
ठंडी सुबह में गर्म सा विश्वास,
नए सवेरे का हो एहसास।

बीता अंधेरा पीछे छूटे,
हर मन का डर धीरे-धीरे टूटे।
मकर संक्रांति कहती यही,
हर अंत के बाद शुरुआत नई।

खलिहानों में मेहनत हँसती,
धरती अन्न से खुद को सजाती।
किसान के हाथों में भविष्य,
परिश्रम बनता है उसकी शक्ति।

तिल और गुड़ का सरल सा स्वाद,
सिखलाए जीवन का सच्चा पाठ।
कड़वाहट छोड़ मिठास अपनाओ,
दिल से दिल का रिश्ता निभाओ।

नदियों के तट पर शांत प्रार्थना,
मन को देती नई धारणा।
दान में नहीं बस धन की बात,
भावों से बढ़ती है मानवता की पहचान।

आसमान में रंगों की रेखा,
पतंगों ने सपना फिर देखा।
ऊँचाई छूना बुरा नहीं,
पर ज़मीन से न टूटे कहीं।

डोर बताती संतुलन का मोल,
अति हर जगह करती है गोल।
जीत उसी की होती है सच्ची,
जो विनम्रता को रखे अच्छी।

नव ऊर्जा, नव दृष्टि पाएँ,
हर दिन को पर्व बनाएँ।
मकर संक्रांति का यही सार,
अंदर का सूर्य करे उजियार।

       नाम-पल्लवी पटले
   जिला-सिवनी, मध्यप्रदेश

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