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वसंत पंचमी

माघ शुक्ल की पंचमी तिथि,
जब ऋतु वसंत मुस्काए,
शीत विदा ले धीरे-धीरे,
जीवन नव रस से भर जाए।

न ठिठुरन शेष, न जड़ता भारी,
धूप बने सौम्य सहचरी,
प्रकृति कहे—अब जागो मानव,
आनंद बने जीवन-धुरी।

यह उत्सव है नवचेतन का,
नव आरंभ का मधुर क्षण,
जहाँ जड़ता टूट बिखरती,
और सजग हो मानव-मन।

ज्ञान-वाणी की अधिष्ठात्री,
वीणा-स्वर का पावन भाव,
इस दिन साधक माँगें विद्या,
विवेक, विनय और स्वभाव।

पीला रंग न केवल शोभा,
यह ऊर्जा, आशा का संकेत,
समृद्धि, सृजन, प्रसन्नता,
जीवन में उज्ज्वल परिवेश।

बालक का पहला अक्षर भी,
इसी दिन पाता आकार,
शिक्षा, कला, साहित्य-साधना
पाती नवीन संस्कार।

वसंत सिखाए समरसता,
कटुता का हो अंत प्रहार,
प्रेम, सौहार्द, सहयोग बढ़ें,
मनुष्यता बने व्यवहार।

ज्ञान न ठहरे ग्रंथों तक,
कर्म बने उसका प्रमाण,
सोच, शब्द और आचरण में
झलके सच्चा मानव-ज्ञान।

यह पर्व कहे—भीतर झाँको,
तम से तेज की ओर चलो,
अहं, द्वेष, अज्ञान त्यागकर
स्व-चेतना से स्वयं मिलो।

इसलिए मनाई वसंत पंचमी,
इसलिए इसका मान महान,
ऋतु, ज्ञान और जीवन का
यह पर्व है पावन-प्राण।

वसंत पंचमी का यह पर्व,
ज्ञान-प्रेम का मधुर विधान,
ऋतु, संस्कृति, चेतना संग
जीवन पाए नव सम्मान।

योगेश गहतोड़ी “यश”

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