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पुनीत पर्व गणतंत्र

साजिशें तुम हजार करो
लेकिन जिन्होंने
परिश्रम से पर्वतों पर
फहराए हैं ध्वज
पीढ़ियां गाती रहेंगीं
उनका यश
ध्वज के तीन रंग
त्याग , तपस्या और अहिंसा
गणतंत्र की यही मीमांसा
जिसमें होसबके अधिकार
हो कर्तव्यों में हिस्सा
मत पूछो देश ने
तुम्हें मैं क्या दिया है?
माटी और मां एक ही है
मातृभूमि का वंदन है
ये पुण्यभूमि चंदन है
अभिनंदन अभिनन्दन है
गणतंत्र दिवस पर
कोटि-कोटि जन का
अभिवादन है, अभिवादन है l

रचनाकार
राम वल्लभ गुप्त ‘इंदौरी’

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