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स्वयं से छल

राग-द्वेष के इस जीवन में, मन को अपने केंद्र बनाकर।
ख़ुद को ख़ुद से छलते जाते, अब बताओ दोष नहीं है?

कल्पवृक्ष के नीचे बैठे, इच्छाओं का जाल बुनाकर।
अपेक्षाओं से कुंठित होकर, आता कोई रोष नहीं है?

बेमतलब की दुनियादारी में, अपना तुम समय गँवाकर।
कर्तव्य-विमुख होकर बैठे, तब आता आक्रोश नहीं है?

क्षणिक सुखों की आशा में, अपने मन में स्वार्थ जगाकर।
परमार्थ को भूल चुके हो, अब आता कोई जोश नहीं है?

कितने दिन का यह जीवन है, उसमें नूतन स्वप्न सजाकर
केवल स्वप्नों में जीने से, होता कोई अफ़सोस नहीं है??

–ऋचा चंद्राकर

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