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अधूरी ‘हाँ’


सुबह आई भी तो थोड़ी देर से आई अभी,
रात ने जाने ही नहीं जाने दिया अभी।

उठ गई बिस्तर से, पर मन तो वहीं बैठा है,
उस कुर्सी पर जहाँ कल वह था वही अभी।

आईने में जो थकी आँखें दिखीं, समझा यह,
ख़ुद से भागी नहीं हूँ मैं कहीं अभी।

हाथ में फ़ोन है, पर खोलने का साहस नहीं,
कुछ कहने की समझ भी नहीं अभी।

उसकी बातों में न शिकवा, न कोई सवाल,
बस यह एहसास कि प्रेम बोझ नहीं अभी।

यही एहसास मुझे डराने लगा चुपचाप,
इतना सुरक्षित भी कुछ कैसे सही अभी?

बाहर ज़िंदगी तेज़ी से चलती ही रही,
और भीतर सब ठहरा-सा रहा अभी।

‘न’ मैं कह भी नहीं सकती, यह जानती हूँ,
और ‘हाँ’ भी तो पूरी मेरी नहीं अभी।

लिखा—मुझे थोड़ा वक़्त चाहिए तुमसे,
फिर मिटाया, यही बात न रही अभी।

“तुम्हारा प्रेम सच्चा है”—यह पंक्ति मगर,
मैं मिटा न सकी, बस यही कही अभी।

न यह इंकार था, न पूरा-पूरा इज़हार,
यह अधूरी-सी, सच्ची ‘हाँ’ रही अभी।

डर के साथ दिल को राहत भी महसूस हुई,
मैंने प्रेम से तो पीठ नहीं फेरी अभी।

कौन जाने कि कहानी कहाँ जाकर रुके,
कभी-कभी शुरुआत यहीं से चली अभी।

आर एस लॉस्टम

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