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शायद आज

शायद आज उनसे मिलन हो जाए,
दिल के तार ज़रा और छिड़ जाए।

कई दिनों से जो ख़ामोशी थी,
वो आज लफ़्ज़ बनकर बिखर जाए।

जब वो सामने आकर ठहरें,
तो नज़र मेरी नज़र से टकराए।

होंठ कुछ कहना चाहें उनसे,
पर दिल है कि धड़ककर रुक जाए।

कहीं ऐसा न हो मुस्कान उनकी,
मेरे सारे सब्र को तोड़ जाए।

जो राज़ बरसों से सीने में हैं,
एक नज़र में सब खुल जाए।

बहुत मासूम दिल के सनम हैं मेरे,
बात-बात पर रंग बदल जाएँ।

कहीं वो बाहों में यूँ समेट लें,
कि ये फासला ही मिट जाए।

आर एस लॉस्टम

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