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संसार की भटकन

दूनियाँ मे भटकाव की गंदी हवा भीषण है तुम कहीं बह ना जाना
जीवन तुम्हारा है इसे हर हाल तुम्हे ही है निभाना

पाप की चारों ओर बहार है
दिखता इसमे बस सुनहरा संसार है

चार दिन की ये छदम रोशनी है फिर बस अन्धेरा ही अन्धेरा है
जो बह गया इस रोशनी के जाल मे फिर ताजिंदगी नही कोई सवेरा है

वास्तविक सुख पाने खातिर छदम सुख त्यागना होता है
चार दिन की खुशी की बजाय अनंत सुख तलाशना होता है

धर्य एवं सन्तोष ही जीवन के वास्तविक सुख का कारण होते है
लालच लोभ मोह माया जीवन मरण जैविक उदाहरण होते है

शुद्ध आहार विचार ही नैतिक जीवन की कसौटी है
नियन्त्रित इच्छायें सादा जीवन योग ही आरोग्य जीवन की परिपाटी है

ये संसार एक भटकाव की भूल भुलैया है
ईश्वर की सच्ची साधना पार ले जानेवाली खिवैया है


संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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