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मत काटो श्वासों की डोर

मत काटो श्वासों की डोर कभी नहीं मिलेगा कोई छोर।
स्नेहपूर्ण किया करो सभी के साथ हर बात पर गौर।।

जब तक ज़िंदगी है प्रेम और प्रेरणा संग बिताया जाए।
न किसी की तीन में तथा न तेरह में समय बिताया जाए।।
बेवज़ह व बेकार में कभी नहीं किसी को सताया जाए।
सुंदर मन से हमेशा के लिए ईर्ष्या आदि हटाया जाए।।

मत काटो श्वसन की डोर यह जीने का आधार है।
इसी से है गति, इसी से स्पंदन, इसी से संसार है।।
स्नेह और सहानुभूति का रहना चाहिए प्रसार है।
नश्वर जगत् में शेष जीवन विशेष बनाने का सार है।।

हर साँस आती-जाती है, यह क्रम निरंतर चलता है।
जन्म से लेकर मृत्यु तक इसी के सहारे मन पलता है।।
चलायमान विश्व में उम्र संग जीवन भी घटता रहता है।
सहयोग व परोपकारी भाव ही भीतर पलता रहता है।।

ईश्वर की भक्ति से ही अंतर्मन में प्रेरणा का प्रवेश होता है।
हर इंसान को अपनी अद्भुत शक्ति का अहसास होता है।।
भक्तजन का ही जीवन सदैव खास व विशेष होता है।
सद्भगति प्राप्ति हेतु सत्कर्मों का श्रीगणेश होता है।।

अर्थपूर्ण ज़िंदगी कभी भी व्यर्थ जाने न पाए।
जीते जी जीवन में खूब संघर्ष किया जाए।।
हम नेक कार्यों से सबके गले का हार बन जाएँ।
मत काटो श्वासों की डोर हँस कर सबके मन को भाएँ।।

कवयित्री-डॉ. ऋचा शर्मा “श्रेष्ठा” करनाल (हरियाणा)

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