
खामोश हैं जुल्मी हवाऍं ,
गगन में ये क्यूॅं खामोशी ।
पागल से हैं दिवा निशा ,
मौसम में क्यूॅं मदहोशी ।।
बारिश सा मोशन बना ,
किंतु बरसा बारिश नहीं ।
बेमौसम में यह बरसता ,
जैसे इसका वारिस नहीं ।।
खामोश सी घटाऍं यहाॅं ,
जैसे हो झमाझम पानी ।
इंद्रासन में भी खामोशी ,
खामोश है सबकी बानी ।।
चाह थी जब बारिश की ,
तब बारिश बरसा नहीं ।
जब चाह नहीं बरसा की ,
तब बारिश ने बरसा की ।।
खामोशी ये बड़ा जहर है ,
बरसाता ये भारी कहर है ।
कभी खामोशी अर्द्धरात्रि ,
कभी खामोशी दोपहर है ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।









