
माटी की गोद में जो जन्मा,
पसीने से लिखता है इतिहास,
सूरज संग जागता प्रतिदिन,
सपनों में हरियाली की आस।
धूप तपे तो तन झुलस जाए,
मेघ बरसें तो मन हरषाए,
आंधी-तूफ़ाँ से लड़ता रहता,
धरती को फिर से मुस्काए।
बीजों में विश्वास जो बोकर,
जीवन का यज्ञ रचता है।
श्रम की गंगा बहाने वाला,
वह सच्चा देवता धरती का है।
कर्ज़ों के बोझ तले दबकर,
फिर भी आशा नहीं छोड़ता,
संतान-सी फसलों को पालें,
अपने दु:ख से मुँह मोड़ता।
तेरी महिमा अति अपरम्पार,
हे अन्नदाता! तुझको नमन,
तेरे श्रम से ही यह जग जीता,
तू ही भारत की असली शान।
योगेश गहतोड़ी “यश”









