
सिंह गर्जना सा स्वर जिनका, नभ तक गूँज उठाता था,
मातृभूमि की रक्षा खातिर, जीवन अर्पित कर जाता था।
साहस जिनका ढाल बना था, नीति जिनकी तलवार थी,
स्वराज्य स्वाधीनता का स्वप्न लिए, हर धड़कन तैयार थी।
रण में बिजली-सी गति उनकी, दुर्ग स्वयं झुक जाते थे,
अन्यायों की काली रातें, नाम सुनते ही छँट जाते थे।
माँ जीजाबाई के संस्कारों का वह अनुपम वरदान थे,
धर्म, प्रजा और राष्ट्र हेतु वे सच्चे प्रहरी महान थे।
नमन तुम्हें हे छत्रपति वीर, तुमसे भारत का मान है,
त्याग, पराक्रम, धर्मनिष्ठा, ही एक सच्ची पहचान है।
जब-जब साहस सो जाएगा, इतिहास तुम्हें दोहराएगा,
हर युवा के रक्त में फिर से, शिवाजी जाग उठेगा।
स्वाभिमान की ज्योति प्रखर थी, अन्यायों से टकराते थे,
जब रणनीति के सूक्ष्म पथों पर, शत्रु स्वयं भरमाते थे।
गुरिल्ला रण की अद्भुत लीला, जग को राह दिखाती थी,
छत्र तले स्वराज्य धरा पर, नव प्रभात जगाती थी।
सिंहासन पर आसीन होकर भी, मन जन-जन में बसता था,
राजधर्म का पालन करके, आदर्श जगत जो रचता था।
वीर शिवा की अमर कहानी, युग-युग तक दोहराई जाएगी,
भारत माता की संतानों में, फिर से ज्योति जगाई जाएगी।
योगेश गहतोड़ी “यश”









