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आईना सवाल करता रहा है”

दिल में नफ़रत का अँधेरा क्यों पल रहा है,
आदमी ही आदमी से क्यों जल रहा है।

हाथ खाली थे मगर आँखों में सपने थे,
वो ही सपना आज सच में ढल रहा है।

भीड़ सच को पत्थरों से तोलती रही,
एक सच फिर भी चुपचाप चल रहा है।

नाम ऊँचा हो गया बाज़ार में उसका,
पर वो अंदर से ही अंदर गल रहा है।

रोटियाँ कम थीं मगर इज़्ज़त बहुत थी,
आज पैसा है मगर दिल खल रहा है।

वक़्त की आँधी से जो डरकर झुक गया,
वो ही अपने आप से ही छल रहा है।

मैंने सीखा है अँधेरों से लड़ना भी,
तभी सूरज मेरे हिस्से निकल रहा है।

मत समझ दुनिया को दुश्मन हर घड़ी,
तेरा ही आईना तुझसे सवाल कर रहा है।

‘ओम कश्यप’ सच की राहों पे यूँ अड़ा रहा है,
झूठ का हर किला उसके सामने गिरा रहा है।

ओम कश्यप

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