
ओस की बूंदों का अब वो जमना छूट गया,
मिश्री वाणी के धागों का बंधना टूट गया।
नमी पलकों में ठहरी है, पर सुकून कहीं खोया है,
शायद मेरे हिस्से का सवेरा ही कहीं सोया है।
आशा की किरणें वो कांच की तरह चटक गईं,
ममता की छाँव राहों में ही कहीं भटक गईं।
जो रूह का सहारा था, वो हाथ अब छूट रहा है,
यकीनन आज मेरा खुद से ही रिश्ता टूट रहा है।
चली ऐसी वक्त की आंधी कि हर ख्वाब का तिनका बिखर गया, जिसे रूह से बांधना चाहा था, वो धागा हाथों से फिसल गया। अब न कोई दर्द उठता है, न आँखों में कोई प्यास बाकी है, सिमट गई है ज़िन्दगी, बस एक खामोश अहसास बाकी है।
सर झुकाकर वो प्यार का नज़राना अब पेश न होगा,
मेरे खामोश लफ्जों में अब कोई सन्देश न होगा।
पिघलकर मोम की तरह, अब खुद ही में जलना होगा,
दुनिया की इस भीड़ में, अब तनहा ही चलना होगा।
उजड़ गया है दिल का वो खूबसूरत सा आशियाँ,
मजबूरियों की धुंध में खो गया मेरा सारा जहाँ।
लिखती है रजनी कलम से अपनी ये गम-ए-दास्ताँ,
कि ख़ामोशी की चादर में सिमट गया है मेरा कारवाँ।
रजनी कुमारी
लखनऊ, उत्तर प्रदेश











