
हाँ, मुझे प्रेम है,
अपने वतन से,जहाँ रहता हूँ ,
अफने बदन से, जो मेरे पास है,
अपने माँ से जिसने जन्म दिया है,
अपने बहन से,राखी जिसने बांधी है
उस भाई से प्रेम है,जो सहोदर है मेरे
उनसे प्रेम है बहुत, जो सखा है मेरे
और प्रेम है उससे भी,रहते जो हरवक्त है
प्रेम तो,,मुझे अपने हमसफर से है
जो ,मुझसे भी,अथाह प्रेम करती है
मेरे खातिर जो,अपने सबकुछ छोड आयी है
प्रेम ,,और उनसे भी है,जो मेरे खुशी ढूँढती है
–और सबो का प्रेम,निश्चल है,निस्वार्थ है,,
ऐसा,इसिलिए कि,मुझे कभी गम मिला नही,
खुशी मेरा छीना नही,पराया समझा नही
तो,आप ही बताये??
प्रेम है न,,सबो से??
होना भी चाहिये, सबो से प्रेम,,
बस,,एक उपाय करके देख लो,,
सबको मुक्त कर दो,,,,,,
न बंधन,न मोह,,न लोभ,न काम,बस,सब,,मुक्त
फिर देखो ,,कितनी सुन्दर दुनिया बसेगी,
सब प्रेम करेगे,प्रेम देंगे, साथ रहेंगे, यदि मुक्त करेगे?
बस,यही है,,चुन्नू कवि के ख्याल से,
सभी से,प्रेम का सरल उपाय,
फिर तो,,आप भी कह उठेगे कि,,
हाँ,,मुझे प्रेम है,,
चुन्नू साहा पाकूड झारखण्ड











